माणिक्य
भगवान सूर्य को ग्रहराज कहा जाता है, इन्हीं के प्रताप से मानव जीवन का विकास होता है. कुण्डली में सूर्य की क्षीण स्थिति को शक्तिपूर्ण बनाने के लिए सूर्यरत्न माणिक्य धारण के लिए परामर्श दिया जाता है। माणिक्य एक अत्यधिक मूल्यवान तथा शोभायुक्त रत्न है ।
ऐसा विश्वास है कि माणिक्य विष को दूर कर देता है, प्लेग से रक्षा करता है; दुख से मुक्ति प्रदान करता है, मन में बुरे विचारों को आने से रोकता है तथा धारण करने वाले पर विपत्ति आने वाली हो, तो उसका रंग बदल जाता है।
माणिक्य पहन कर सूर्य उपासना करने से सूर्य की पूजा का फल दुगना हो जाता है। सूर्य प्रभावित रोगों में सिर पीड़ा, ज्वर, नेत्र विकार, पित्त विकार मूर्च्छा, चक्कर आना, दाह (जलन) हृदय रोग, अतिसार अग्नि शस्त्र एवं विष जन्य विकार, पशु एवं शत्रुभय, दस्यु पीड़ा, राजा, धर्म, देवता, ब्राह्मण, सर्प, शिव आदि की अप्रतिष्ठा से चित्त विकार एवं इनसे भय आदि होते हैं; मानहानि, पिता और पुत्र में विचार नहीं मिलते।
हृदय और रत्न – सूर्य व्यय का प्रतिनिधि है। रत्नों में वह माणिक्य का प्रतिनिधि है। इसलिए व्यक्ति को सूर्य को बल देने के लिए माणिक्य धारण करना बताते हैं हृदय के सभी प्रकार के कष्टों, अथवा रोगों में सोने की अंगूठी में माणिक्य पहनना लाभदायक माना गया है। इसमें वात, पित्त, कफ को शांत करने की कोष्ठबद्धता आदि दूर करता है। इसका भस्म शरीर में उत्पन्न उष्णता और जलन को दूर करता है। पिष्टी और भस्म दोनों औषधि के रूप में उपयोग में लाभकारी है।
माणिक्य के प्राप्ति स्थान – दक्षिण भारत से प्राप्त होने वाला माणिक्य अपारदर्शक होता है। इसका रंग गुलाबी श्याम आभा लिए हुये होता है। दक्षिण भारत से प्राप्त होने वाला यह माणिक्य उच्चकोटि का नहीं कहा जा सकता।
काबुल मे भी माणिक्य मिलता है। यहां का माणिक्य पानीदार होता है यह कुछ पारदर्शक होता है। सर्वोत्तम माणिक्य वर्मा की खानों से प्राप्त होता है। वर्मा का माणिक्य कमल पुष्प के रंग का होता है लेकिन कभी-कभी गहरे लाल रंग का भी प्राप्त होता है।
श्याम राष्ट्र में भी माणिक्य की खानें हैं। लेकिन इस माणिक्य की वर्मा के माणिक्य से तुलना नहीं की जा सकती। यहां का माणिक्य कालापन लिये हुए होता है।
अफ्रीका में भी माणिक्य की उपलब्धि होती है। लेकिन यहाँ का माणिक्य भी उच्चकोटि का नहीं होता। यहां का माणिक्य रक्त-पीत वर्ण का होते हुए श्याम आभा युक्त होता है।
श्रीलंका में भी माणिक्य प्राप्त होता है, लेकिन यह माणिक्य बर्मा के माणिक्य की अपेक्षा कम उत्तम होता है।
माणिक्य की पहचान
- माणिक्य को हाथ में लेकर देखें। माणिक्य हाथ में लेने पर सोने की तरह भारी प्रतीत होता है। श्रेष्ठ माणिक्य में गुलाबी आभा अवश्य होती है।
- रत्नपारखी तो माणिक्य को आंखों से देखकर ही उसकी शुद्धता एवं स्तर की घोषणा कर देते हैं।
- माणिक्य से किसी पत्थर पर लकीर बनाई जाय तो लकीर बन जायेगी लेकिन माणिक्य नहीं घिसेगा ।
माणिक्य के दोष – माणिक्य धारण करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि माणिक्य पूर्णरूपेण दोषरहित है। प्रायः माणिक्य दोषरहित नहीं मिलते हैं। पूर्ण दोषमुक्त माणिक्य अमूल्य होता है। इसका मूल्य कुछ भी हो सकता है। माणिक्य में मुख्यतया निम्न दोष पाये जाते हैं।
- जिस माणिक्य में काले अथवा सफेद धब्बे हों वह माणिक्य श्रेष्ठ नहीं होता।
- आड़ी तिरछी रेखाओं से युक्त माणिक्य भी धारण-योग्य नहीं होता।
- माणिक्य यदि पारदर्शी नहीं है तो वह श्रेष्ठ फल नहीं प्रदान करता।
- आब और चमक रहित माणिक्य रत्न नहीं धारण करना चाहिए।
- जिस माणिक्य में एक समान रंग न हो, देखने में कहीं हल्का, कहीं गहरा रंग दिखाई दे, ऐसा माणिक्य धारण करने योग्य नहीं होता।
मोती रत्न
मोती को चंद्र रत्न माना गया है। यह मुख्यतया सफेद रंग का ही होता है किंतु हल्का पीलापन लिये तथा हल्का गुलाबीपन लिये मोती भी मिलते हैं। मोती खनिज रत्न न होकर जैविक रत्न होता है। मूंगे की भांति ही मोती का निर्माण भी समुद्र के गर्भ में घोंधों के द्वारा किया जाता है।
मोती का जन्म – समुद्र में एक विशेष प्रकार का कीट होता है। जिसे घोंघा कहते हैं। यह घाँधे नामक जीव सीप के अंदर रहता है। वस्तुतः सीप एक प्रकार से घोंघे का घर होता है। मोती के विषय में कहा जाता है कि स्वाति नक्षत्र में टपकने वाली बूंद जब घोंघे के खुले हुए मुंह में पड़ती है तब मोती का जन्म होता है।
मोती के जन्म के विषय में वैज्ञानिक धारणा यह है कि जब कोई विजातीय कण घोंघे के भीतर प्रविष्ट हो जाता है तब वह उस पर अपने शरीर से निकलने वाले मुक्ता पदार्थ का आवरण चढ़ाना शुरू कर देता है और इस प्रकार कुछ समय पश्चात् यह मोती का रूप धारण कर लेता है।
मोती के प्राप्ति स्थान – मोती एक प्राणिज रत्न है, यह एक विशिष्ट समुद्री सीप से प्राप्त होता है सभी समुद्री सीपों में मोती उत्पन्न करने की क्षमता नहीं होती है। प्राणिज रत्न, वह भी जलीय प्राणी से प्राप्त होने के कारण यह कुछ विशेष समुद्री तटों, खाड़ियों से प्राप्त किया जाता है।

लंका में मनार की खाड़ी तथा गुजरात के कठियावाड़ के समुद्री तट पर भी मोती प्राप्त किये जाते हैं, लेकिन वह उत्तम कोटि के नहीं होते। फारस की खाड़ी में उत्पन्न होने वाले मोती को ही “बसरे का मोती” कहा जाता है। यह सर्वोत्तम प्रकार का मोती होता है।
बहरीन, बसरा के आस-पास के क्षेत्र, कौसिर तथा जिदद्दा का मोती भी अपनी आब के कारण श्रेष्ठ होता है और अब उपलब्ध भी कम होता है। आस्ट्रेलियाई समुद्री किनारों पर भी मोती प्राप्त होते हैं, लेकिन उच्च कोटि के नहीं होते ।
अब तो मानव मस्तिष्क की करामात से भारत के समुद्री तटों पर सीप के पेट में कण रखकर व्यापारिक उत्पादन किया जा रहा है। इसे ‘कल्चर मोती’ कहते हैं। अब प्राकृतिक के बजाय यह मोती ही अधिकांश रूप से बाजारों में उपलब्ध है।
वर्तमान समय में सबसे अधिक मोती चीन तथा जापान में उत्पन्न होते हैं। चीन तथा जापान में मोतो को विशेष प्रकार से उत्पन्न किया जाता है।
तत्व एवं संरचना – यह प्राणिज्य रत्न, रत्न-विज्ञान की कसौटी पर एक पत्थर है सीप, शंख, कौड़ी आदि की तरह यह भी कैल्शियम कार्बोनेट से निर्मित एक प्राकृतिक रचना है।
मोती की पहचान
- असली मोती प्रायः पूर्णरूपेण गोल नहीं मिलते। कहीं न कहीं सूक्ष्म चक्री होना आवश्यक है।
- असली मोती हाथ में लेने पर भारी नहीं प्रतीत होता है।
- असली मोती दाँत से टूट जाता है, नकली मोती नहीं ।
- असली मोती देखने मात्र से आँखों को शीतलता का आभास होता है।
- असली मोती की ऊपरी परत कठोर नहीं होती उसे आसानी से खुरचा जा सकता है।
- असली मोती को वस्त्र पर रगड़ने से मोती चमक कम होने के बजाय अत्यधिक होती है।
विशेषता एवं धारण करने से लाभ – मोती की प्रमुख विशेषता है कि यह हमें सर्वथा अपने प्राकृतिक रूप में ही प्राप्त होता है। गोल, अण्डाकार अथवा टेढ़ा-मेढ़ा जैसा भी घोंघे के पेट में बनता है, अपने उसी रूप में यह उपलब्ध होता है। अन्य रत्नों की भांति इसकी कटिंग तथा पॉलिस आदि नहीं की जाती और न ही इसे आकार दिया जाता है। अधिक से अधिक माल में पिरोए जाने के लिए इनमें छिद्र ही किये जाते हैं मोती शीतवीर्य होता है अतः इसके धारण करने से क्रोध शांत रहता है तथा मानसिक तनाव भी दूर होता है।
मोती के दोष
- किसी भी प्रकार की दरार अथवा खण्ड होने से मोती दोषपूर्ण होता है और इसे धारण करना श्रेष्ठ नहीं होता। लम्बा, टेढ़ा अथवा चपटा मोती भी धारण करने योग्य नहीं होता। गोल मोती श्रेष्ठ होता है और अच्छा लाभ करता है।
- मोती की सतह पर किसी भी प्रकार की धारियां, अथवा चिन्ह हों तो मोती धारण करने योग्य नहीं होता है।
- मोती को आजकल प्रायः लोग माला में पिरोकर भी पहनते हैं परन्तु मोती में छेद करने से मोती की तत्व संरचना नष्ट हो जाती है और वह धारक को अनुकूल फल नहीं प्रदान करता है।
मूंगा रत्न
मूंगा मंगल ग्रह का प्रतिनिधि रत्न है। अंग्रेजी में इसे कोरल कहते हैं। मूंगा मुख्यतः लाल रंग का होता है। इसके अतिरिक्त मूंगा सिंदूरी, गेरुआ सफेद तथा काले रंग का भी होता है। मूंगा एक जैविक रत्न होता है।
मूंगा के प्राप्ति स्थान – मूंगा समुद्र के गर्भ में लगभग छः- सात सौ फीट नीचे गहरी चट्टानों पर विशेष प्रकार के कीड़े, जिन्हें आईसिस नोबाइल्स कहा जाता है, इनके द्वारा स्वयं के लिए बनाया गया घर होता है। उनके इन्हीं घरों को मूंगे की बेल अथवा मूंगे का पौधा भी कहा जाता है। बिना पत्तों का केवल शाखाओं से युक्त यह पौधा लगभग एक या दो फुट ऊंचा और एक इंच मोटाई का होता है।
कभी-कभी इसकी ऊंचाई इससे अधिक भी हो जाती है। परिपक्व हो जाने पर इसे समुद्र से निकालकर मशीनों से इसकी कटिंग आदि करके मनचाहे आकारों का बनाया जाता है।
मूंगे के विषय में कुछ लोगों की धारणा है कि मूंगे का पेड़ होता है किंतु वास्तविकता यह है कि मूंगे का पेड़ नहीं होता और न ही यह वनस्पति है बल्कि इसकी आकृति पौधे जैसी होने के कारण ही इसे पौधा कहा जाता है। वास्तव में यह जैविक रत्न होता है।
मूंगा समुद्र में जितनी गहराई पर प्राप्त होता है, इसका रंग उतना ही हल्का होता है। इसकी अपेक्षा कम गहराई पर प्राप्त मूंगे का रंग गहरा होता है। अपनी रासायनिक संरचना के रूप में मूंगा कैल्शियम कार्बोनेट का रूप होता है।
मूंगा भूमध्य सागर के तटवर्ती देश अल्जीरिया, सिगली के कोरल सागर ईरान की खाड़ी हिंद महासागर इटली तथा जापान में प्राप्त होता है। इटली से प्राप्त मूंगे को इटैलियन मूंगा कहा जाता है। यह गहरे लाल सुर्ख रंग का होता है तथा सर्वोत्तम मूंगा जापान का होता है।
सामान्यतः मूंगा नारंगी रंग का पाया जाता है। लाल, गुलाबी, सफेद, काले तथा धूम्र रंग के मूंगे भी प्राप्त होते हैं। सर्वश्रेष्ठ मूंगे नारंगी अथवा लाल रंग के ही होते हैं।
तत्व एवं संरचना – मूंगा, कैल्शियम, मैग्नीशियम कार्बोनेट, लौह तथा कुछ अन्य जैविक पदार्थों का संगठन है। मोती की भाँति ही यह भी खनिज नहीं है।
मूंगे की पहचान – असली मूंगे की पहचान निम्नलिखित हैं :-
- असली मूंगा यदि रक्त में रखा जाये तो मूंगे के चारों ओर रक्त शीघ्र ही जमने लगता है।
- प्लास्टिक के मूंगे भी बनने लगे हैं। किसी गरम तार का स्पर्श कराने से सत्यता सामने आ सकती है।
- असली मूंगा हल्का, चिकना और स्पर्श करने पर हड्डी के समान आभास देने वाला होता है।
- असली मूंगे का किनारा यदि रेती से रेता जाये तो काँच या रेत की तरह कड़कड़ाहट की आवाज नहीं होती। बल्कि लकड़ी की तरह की आवाज मालूम पड़ती है।
- असली मूंगे पर किसी माचिस की तिल्ली से पानी की बूंद रखने से बूंद यथावत् बनी रहती है फैलती नहीं है ।
- असली मूंगे पर हाइड्रोक्लोरिक एसिड डालने से उसकी सतह पर झाग उठने लगते हैं किंतु काले मूंगे पर इसका कोई प्रभाव नहीं होता।
- असली मूंगा आग में डालने से जल जाता है और उसमें से बाल जलने के समान गंध आती है।
विशेषता एवं धारण करने से लाभ – मूंगे की प्रमुख विशेषता इसका चित्ताकर्षक सुंदर रंग व आकार ही होता है। यद्यपि मूंगा अधिक मूल्यवान रत्न नहीं होता किंतु इसके इसी सुंदर व आकर्षक रंग के कारण इसे नवरत्नों में शामिल किया गया 1
मूंगा धारण करने से मंगल ग्रह जनित समस्त दोष शांत हो जाते हैं। मूंगा धारण करने से रक्त साफ होता है और रक्त की वृद्धि होती है। हृदय रोगों में भी मूंगा धारण करने से लाभ होता है। मूंगा धारण करने से व्यक्ति को नजर दोष (नजर लगाना) तथा भूत-प्रेतादि का भय नहीं रहता। इसीलिए प्रायः छोटे बच्चों के गले में मूंगे के दाने डाले जाते हैं।
तान्त्रिक प्रयोगों में मूंगे का अपना विशेष स्थान है। मूंगे के अतिरिक्त किसी अन्य रत्नीय पत्थर का उपयोग तांत्रिक प्रयोगों में कम होता है। तंत्र में प्रयोग की जाने वाली मूर्तियाँ यदि मूंगे की बनायी जायें तो श्रेष्ठ होता है। विशेष रूप से गणेश-सिद्धि तथा लक्ष्मी साधना के लिए प्रयोग की जाने वाली मूर्तियां तो मूंगे की ही सर्वश्रेष्ठ होती हैं।
मूंगे के दोष
- चिटका अथवा खड्ड युक्त मूंगा धारण करना स्वास्थ्य तथा सामाजिक परिस्थितियों के लिए शुभ नहीं होता । ऐसा मूंगा नहीं धारण करना चाहिए।
- चमक रहित मूंगा भी धारण करना श्रेष्ठ नहीं होता ।
- जो मूंगा दोरंगा हो वह धारण करने योग्य नहीं होता ।
- काली आभा युक्त मूंगा भी धारण करना निषेध है।
- जिस मूंगे में चूने के समान धब्बे दिखाई दें वह मूंगा भी धारण करने योग्य नहीं होता। टेढ़ा-मेढ़ा मूंगा भी नहीं धारण करना चाहिए।
पन्ना रत्न
पन्ना बुध ग्रह का प्रतिनिधि रत्न माना जाता है। अंग्रेजी में इसे एमराल्ड कहते हैं। पन्ना अति प्राचीन बहुप्रचलित तथा मूल्यवान रत्न होता है । मूल्यवान रत्नों की श्रेणी में इसका तीसरा स्थान है।
पन्ना के प्राप्ति स्थान – सर्वश्रेष्ठ पन्ना उत्पादन का श्रेय भारत को ही है। अजमेर के करीबी क्षेत्रों में पन्ने की खानें हैं, जहां से विश्व का सर्वश्रेष्ठ पन्ना निकाला जाता है। भारत में ही भीलवाड़ा, छतरपुर, उदयपुर क्षेत्रों में भी पन्ने की कुछ छोटी-छोटी खानें हैं।
मेडागास्कर द्वीप, साइबेरिया, ब्राजील, कोलम्बिया, पाकिस्तान, अमरीका तथा अफ्रीका में भी पन्ने की खानें हैं, जहाँ से पन्ना निकाला जाता है।
पन्ना प्रायः पारदर्शी और अपारदर्शी दोनों ही रूपों में पाया जाता है। पारदर्शी पन्ने में प्रायः हल्का-सा जाला अथवा रेशा अवश्य पाया जाता है प्रायः सर्वथा निर्दोष पन्ना कम ही उपलब्ध होता है अगर मिलता भी है तो उसका मूल्य इतना अधिक होता है कि इसे खरीदना आम आदमी के बस का नहीं होता है।
पन्ना अत्यन्त कोमल एवं भंगुर रत्न है। मुद्रिका आदि में जड़वाते समय अत्यन्त सर्तकता बरतना आवश्यक होता है। जरा सी असावधानी से यह टूट सकता है।
पन्ने की पहचान
- पन्ना हाथ में लेने पर अपेक्षाकृत भार से कम प्रतीत हो तो पन्ना नकली समझना चाहिए।
- गरम करने से यदि पन्ने का रंग उड़ जाये तो पन्ने को रंगा हुआ समझना चाहिए।
- असली पन्ने को यदि गरम किया जाये तो वह चिटकता नहीं।
- असली पन्ना पूर्णरूपेण दोष (जाल) रहित मिल पाना प्रायः मुश्किल होता है। जाल रहित पन्ना मिलने पर विशेष जाँच परख के बाद ही खरीदना चाहिए।
- पन्ने को हाथ में लेकर देखने से यह एक विशेष चिकनाहट वाला महसूस होता है।
- पन्ना सुंदर, हरी मखमली घास की भांति प्रियदर्शी हरित वर्ण का होता है। साथ ही यह हरे और सफेद मिश्रित रंग का अपारदर्शी भी होता है।
- पन्ना पारदर्शी तथा अपारदर्शी दोनों ही रूपों में प्राप्त होता है।
- असली पन्ने को लकड़ी पर रगड़ने से इसकी चमक में वृद्धि होती है।
- असली पन्ने पर पानी की बूंद रखने से बूंद यथावत् बनी रहती है।
- इसमें भंगुरता होने के कारण यह गिरने से टूट सकता।
विशेषता एवं धारण करने से लाभ – पन्ना नेत्र रोग नाशक व ज्वर नाशक होता है। साथ ही पन्ना सन्निपात, दमा, शोध आदि व्याधियों को नष्ट करके शरीर में बल एवं वीर्य की वृद्धि करता है।
पन्ने की प्रमुख विशेषता यह है कि पन्ना धारण करने से बुध जनित समस्त दोष नष्ट हो जाते हैं। इसके धारण करने से धारक की चंचल चित्त वृत्तियां शांत व संयमित रहती हैं तथा धारक को मानसिक शांति प्राप्त होती है। इसके धारण करने से मन एकाग्र होता है। यह काम, क्रोध आदि विकारों को शांत कर धारक को असीम सुख शांति प्रदान करता है। इसीलिए ईसाई पादरी लोग प्रायः धारण किए रहते हैं।
पन्ने के दोष
- चमक रहित पन्ना सुन्न कहा जाता है। ऐसा पन्ना धारण करने योग्य नहीं होता ।
- बीच में एक सीधी रेखा रखने वाला पन्ना भी श्रेष्ठ नहीं होता। इसे धारण नहीं करना चाहिये ।
- गुंथे हुए जाल से युक्त पन्ना भी लाभकारी नहीं होता। ऐसा पन्ना भी धारण करने योग्य नहीं माना जाता ।
- रूखा तथा गड्ढों युक्त पन्ना भी पहनने योग्य नहीं होता।
- काले अथवा सफेद धब्बों से युक्त पन्ना भी धारण नहीं करना चाहिए।
- धब्बा युक्त पन्ना भी श्रेष्ठ नहीं कहा जाता। ऐसा पन्ना भी धारण करने योग्य नहीं होता। चिटका अथवा खंडित पन्ना भी धारण करने योग्य नहीं होता।
पुखराज रत्न
पुखराज गुरु गुणों वाला रत्न माना गया है। पुखराज पीला, लाल तथा सफेद रंगों में भी पाया जाता है तथा इसे दिव्य गुणों वाला रत्न भी माना गया है। इसकी परख के लिए अगर कांच के गिलास में गाय का दूध भर कर इसे डाल दें, तो एक घंटे बाद पुखराज के रंग की किरण ऊपर सतह तक जाती प्रतीत होती है। इसे गुरुवार को दिन में सुवर्ण अंगूठी में, धनु, अथवा मीन लग्न में धारण करना चाहिए।
आकाश तत्वों को स्वयं में संजोये रखने वाला ग्रह गुरु व्यक्ति की बुद्धि को प्रभावित करने में सक्रिय भूमिका निभाता है। गुरू को बृहस्पति नाम से भी पुकारा जाता है। लेखन, प्रकाशन तंत्र-मंत्र, वेद-शास्त्र, विवेक, सदाचार, तथा सौम्य व्यवहार आदि का कारक भी गुरू ही है।
पुखराज एक अत्यन्त आकर्षक तथा तेजस्वी रत्न है दोष रहित खूबसूरत पुखराज देखने मात्र से आंखों को एक सुख, शांति का आभास जैसा होता है।
पुखराज प्राप्ति स्थल – भारत में असली पुखराज प्राप्त नहीं होता। पीले नीलम अथवा पीले स्फटिक को ही पुखराज कह कर जौहरी बेच देते हैं। ब्राजील ही ऐसा एक मात्र स्थान है, जहां से दुनिया भर में सबसे अधिक और उत्तम कोटि का पुखराज प्राप्त होता है। ब्राजील का पुखराज प्रायः पीले कनेर पुष्प के रंग वाला अत्यधिक आबदार होता है तथा सफेद भी मिलता है।
यूराल पर्वत श्रेणी से भी पीत तथा सफेद आभा वाले पुखराज प्राप्त किए जाते हैं। श्री लंका में खानों प्राप्त होने वाले पुखराज पीले, सफेद तथा अन्य मिश्रित रंगों में भी होते हैं।
बर्मा में तवाय नामक स्थान पर पुखराज निकाले जाते हैं। यह पुखराज प्रथम श्रेणी के नहीं होते। वर्मा के पुखराज अधिकतर सफेद ही होते हैं और कभी-कभी देखने में विक्रान्त अथवा हीरक खण्ड का आभास देते हैं।
पुखराज एक खनिज पत्थर है। रसायनविदों के अनुसार यह एल्यूमिनियम फ्लोरीन तथा हाइड्रोक्सिल तत्वों से निर्मित एक सिलीकेट मात्र है। पुखराज को सिलीकेट में जल तथा कुछ अन्य अशुद्धियों के कारण ही विभिन्न रंग देखने को मिलते हैं। पुखराज का शुद्ध सिलीकेट पूर्णरूपेण स्वच्छ जल के समान पारदर्शक सफेद होता है यह सिलीकेट ही सफेद पुखराज के नाम से जाना जाता है।
लेकिन गुरु रत्न के रूप में पीला पुखराज ही मान्य है। पीले पुखराज में पीलापन फ्लुओंसिलीकेट में किसी प्रकार की अशुद्धियों के कारण ही जन्म लेता है। लेकिन यह अशुद्धि ही पुखराज को गुरु रत्न के रूप में प्रतिष्ठित करती है।
श्वेत पुखराज ज्ञानवर्धक, लाल पुखराज शक्तिवर्धक, तथा पीला पुखराज सुख और धनवर्धक माने गये हैं।
पुखराज की परख – पुखराज एक ऐसा रत्न है, जिसे खरीदने में प्रायः धोखाधड़ी का सामना करना पड़ता है। उड़ीसा की एक नदी में पीले रंग का स्फटिक प्राप्त होता है। इस स्फटिक को पुखराज बताकर अधिकांश जौहरी ग्राहकों को बेच देते हैं। अतः पुखराज खरीदते समय विशेष जांच परख आवश्यक है।
- पुखराज हाथ में लेने पर विशेष स्वर्ण के समान भार की अनुभूति होती है।
- शुद्ध पुखाराज की पहचान करने के लिए उसे गरम करें तो नकली पुखराज अपने पूर्व रंग को त्याग करके नितान्त श्वेत वर्ण का हो जाता है।
- गोमूत्र तथा दुग्ध के मिश्रण में पुखराज डाल कर रात भर रख दें। सुबह निकालने पर यदि पुखराज में रंग परिवर्तन हो या चमक कम हो जाये तो पुखराज नकली समझना चाहिए।
- असली पुखराज को यदि सूर्य की रोशनी में देखा जाये तो आने वाली किरणें सीधी न होकर वक्री होती हैं।
पुखराज के दोष
- दूधकयुक्त पुखराज जीवन के लिए घातक माना गया है। ऐसा पुखराज धारण करने योग्य नहीं होता।
- आभाहीन पुखराज कभी भी धारण नहीं करना चाहिए। यह स्वास्थ्य के लिए कष्टप्रद होता है। रक्तवर्ण धब्बा युक्त पुखराज भी धारण योग्य नहीं होता।
- दो रंग वाला पुखराज धारण करने वाला व्यक्ति संतान बाधा का शिकार होता है।
- दूध जैसे रंग का पुखराज भी अशुभ माना गया है। इसे धारण नहीं करना चाहिए।
रत्न राज हीरा

नमस्कार । मेरा नाम अजय शर्मा है। मैं इस ब्लाग का लेखक और ज्योतिष विशेषज्ञ हूँ । अगर आप अपनी जन्मपत्री मुझे दिखाना चाहते हैं या कोई परामर्श चाहते है तो मुझे मेरे मोबाईल नम्बर (+91) 7234 92 3855 पर सम्पर्क कर सकते हैं। धन्यवाद ।
हीरा को महारत्न की श्रेणी में रखा गया है। यह संसार का सर्वाधिक चमकीला और सम्मोहक रत्न है। हीरा सभी रत्नों की अपेक्षा कठोर होता है। हीरा सभी पदार्थों को खुरच सकता है परन्तु इसे कोई नहीं खुरच सकता। सौन्दर्य, टिकाऊपन और दुर्लभता के कारण यह अधिक कीमती माना गया है। भारतीय हीरा सर्वोत्तम माना गया है जो कि विश्व में सबसे अधिक कीमत वाला होता है।
शुक्र के शुभ प्रभाव को बढ़ाने के लिए हीरा धारण करना लाभदायक माना गया है। निम्न स्थितियों में हीरा धारण करना आवश्यक हो जाता है :-
- जब शुक्र शुभ भावेश हो और अपने भाव से 6 या 8वें घर में उपस्थित हो ।
- जब शुक्र कुंडली में नीच राशि में हो, वक्री हो, अस्त हो या पाप ग्रहों के प्रभाव में हो ।
- उपर्युक्त स्थिति के शुक्र की महादशा, या अंतर्दशा चल रही हो।
- जिन व्यक्तियों को विषैले जीव-जंतुओं के बीच में रहना पड़ता हो।
- व्यापारिक प्रतिनिधि, फिल्मी अभिनेता एवं अभिनेत्रियां, फिल्म निर्माता तथा किसी भी कला क्षेत्र से जुड़े हुए व्यक्ति तथा प्रेमी-प्रेमिका भी इसे धारण कर लाभ ले सकते हैं।
- भूत-प्रेत व्याधि से पीड़ित व्यक्ति भी हीरा धारण कर लाभ ले सकते हैं।
शुद्ध हीरे को गर्म पानी, गर्म दूध या तेल में डालने पर यह उसे ठंडा कर देता है। शुद्ध हीरे पर किसी भी वस्तु की खरोंच का चिह्न नहीं बन सकता। दोषयुक्त हीरा कभी धारण न करें जो हीरा धूम्र वर्ण हो, जो मुख पर लाल, या पीला हो, उसे धारण करें। हीरे पर किसी प्रकार की रेखा, बिंदु, या कटाव नहीं होना चाहिए। अंगूठी में जड़ने के लिए कम से कम एक रत्ती वजन का हीरा होना चाहिए। वैसे जितना अधिक वजन का हीरा धारण किया जाएगा, उतना अच्छा परिणाम प्राप्त होगा। हीरे के साथ माणिक्य, मोती, मूंगा और पीला पुखराज न पहनें।
एक बार धारण किये हुए हीरे का प्रभाव 7 वर्ष तक रहता है। उसके बाद उसे पुनः विधिवत दूसरी अंगूठी में धारण करना चाहिए।
हीरे को चांदी, या प्लैटिनम में दाहिने हाथ की कनिष्ठिका (सबसे छोटी अंगुली) में शुक्रवार को प्रातः काल धारण किया जाना चाहिए।
अंगूठी निर्माण करते समय शुक्र वृष, तुला, या मीन राशि में हो, अथवा शुक्रवार के दिन भरणी, पूर्वाषाढ़, पूर्वाफाल्गुनी में से कोई भी नक्षत्र हो, तब यह अंगूठी निर्माण करना चाहिए ।
अंगूठी निर्माण के बाद उस अंगूठी की पूजा, प्राण प्रतिष्ठा, हवन आदि क्रिया करने के पश्चात शुक्रवार को, प्रातःकाल, पूर्व दिशा की ओर मुंह कर के धारण करनी चाहिए। यदि ऐसा करना संभव न हो तो शुक्र के पौराणिक मंत्र ‘ऊं शुं शुक्राय नमः’ की एक माला जप कर उपर्युक्त मुहूर्त में अंगूठी धारण की जा सकती है।
स्त्रियों को हीरा धारण करने का निषेध मिलता है। पुत्र की कामना रखने वाली स्त्री को हीरा नहीं पहनना चाहिए। वे स्त्रियां जिनको पुत्र संतान हैं, परीक्षणोपरांत हीरा धारण कर सकती हैं।
नियमानुसार धारण किया गया हीरा व्यक्ति को सुख, ऐश्वर्य, राजसम्मान, वैभव, विलासिता आदि देने में पूर्ण सक्षम होता है। लेकिन किसी योग्य दैवज्ञ से कुंडली परीक्षणोपरांत ही हीरा धारण करें। हीरा अपना शुभाशुभ परिणाम शीघ्र देता है।
हीरे का प्राप्ति स्थान – संसार में सर्वप्रथम दक्षिण भारत के गोलकुण्डा में हीरे की खान मिली थी। आज भी भारत में कई स्थानों पर हीरे की खानें हैं। 1725 में ब्राजील में एक खान का पता चला जिसमें प्राकृतिक हीरे अधिकांश पाये गये। वर्तमान में हीरे का सर्वाधिक उत्पादन दक्षिण अफ्रीका में है।
तत्व एवं संरचना – हीरा शुद्ध कार्बन है इसमें किसी भी अन्य तत्व की मिलावट नहीं है। इसे जलाने पर यह पूरी तरह कार्बन डाईऑक्साइड बन कर उड़ जाता है। हीरे पर अम्ल का कोई भी असर नहीं पड़ता। रंगीन हीरे को जलाने पर कुछ शेष हिस्सा बच जाता है।
हीरे की पहचान – हीरों में से कुछ स्वच्छ पारदर्शक और कुछ अपारदर्शक भी पाये जाते हैं। उच्च कोटि के हीरे चिरकाल के प्रयोग के बाद भी नहीं घिसते और न ही खराब होते हैं।
हीरे का दोष
- हीरे पर जल के समान विन्दु या छींटा होना हीरे को दोषी साबित करता है।
- कभी-2 हीरे पर काले बिन्दु पाये जाते हैं वे भी दोषी माने जाते हैं।
- हीरे पर श्वेत, पीला, लाल और काला बिन्दु अशुभ माना जाता है।
- तेलियापन, जर्दी, कम चमकवाला, खड्डायुक्त हीरा भी दोषी माना जाता है।
- पाण्डु रंग का पीले रंग का रेखाओं वाला, गड्ढो वाला, आदि कई दोष हीरे में पाये जाते हैं, जिन्हें हीरे का दोष माना गया है।
नीलम रत्न
नीलम के स्वामी शनि देवता हैं। ज्योतिष शास्त्र में शनि की दशा दुर्दशा और दुख की द्योतक मानी जाती है। इसलिए शनि के कोप को शांत करने के लिए सहज उपाय नीलम धारण करना माना जाता है।
नीलम सत्य और सनातन का प्रतीक है विवेकशीलता, सत्य तथा कुलीनता जैसे गुण इसके साथ जुड़े हुए हैं।
शुभ फलदायक सिद्ध होने पर यह धारणकर्त्ता के रोग, दोष, दुख-दारिद्रय नष्ट कर के, धन-धान्य, सुख-संपत्ति, बुद्धि, बल, यश, आयु और कुल, संतति की वृद्धि करता है। नीलम धारण करने से स्त्रियों में अनैतिकता नहीं आती।
प्रेमियों के लिए यह भाग्यवान रत्न माना जाता है। यह प्रसन्नतावर्धक है, परंतु पापी व्यक्ति को विपरीत फल देता है। नीलम दिलोदिमाग को सुकून देने वाला माना गया है, जो श्वास, खांसी और पित्त की बीमारी को कम करता है।
विश्वास यह है कि नीलम को बेच देने के बावजूद वह मूल धारक की रक्षा करता है। नीलम के लिए कहा जाता है कि इसे विषैले सांप के साथ रखने पर सांप मर जाता है। कहते हैं, भूत-प्रेत से छुटकारे में भी नीलम असरकारी है। यह धारणा भी है कि ईश्वर की इच्छा का संकेत नीलम से प्राप्त होता है और इससे सही भविष्यवाणी संभव है। दुष्ट और अपवित्र व्यक्ति द्वारा पहनने पर नीलम की चमक लुप्त होने की बात भी की जाती है विष की काट के रूप में नीलम को काफी असरकारक माना गया है। रक्त प्रवाह रोकने में यह श्रेष्ठ मरहम माना जाता है।
खूनी नीलम सर्वाधिक असरकारक माना जाता है और सावधानी से धारण करने की हिदायतों के साथ दिया जाता है, क्योंकि कुछ दिन तक धारण करने पर अनिष्ट होना भी संभव है। अतः धारक को सचेत भी रहना पड़ता है।
नीलम प्राप्ति स्थल – नीलम श्रीलंका, बर्मा, थाईलैंड से उत्तम और प्रचुर मात्रा में प्राप्त होते हैं, परंतु कश्मीर प्रदेश से प्राप्त नीलम सबसे उत्तम होते हैं, जिन्हें ‘मयूर नीलम’ कहते हैं, क्योंकि इनका रंग मोर की गर्दन के रंग की तरह का होता है। यदि इनमें एक बूंद रंग भी हो, तो संपूर्ण नग रंगीन हो जाता है। कश्मीरी नीलम बिजली के प्रकाश में अपना रंग नहीं बदलता, जबकि अन्य स्थानों से प्राप्त नीलम बिजली के प्रकाश में स्याह रंग के दिखाई देते हैं।
तात्विक संरचना – नीलम कुरून्दुम समूह का ही एक भंगुर रत्न है। अल्यूमिनियम तथा आक्सीजन के योग से निर्मित यह रत्न कोबाल्ट मिश्रित होने के कारण नीले रंग का दिखाई देता है। माणिक्य भी कुरून्दुम समूह का ही रत्न है, लेकिन नीलम की कठोरता माणिक्य से अपेक्षाकृत कम होती है।
नीलम की परख
- असली नीलम धूप में रखा जाये तो नीलम से किरणों का एक फब्बारा जैसा फूटता दिखाई देता है। स्वच्छ जल भरे गिलास में डालने पर नीलम से विशेष चमक वाली नीली किरणें निकल कर आंखों में चुभती सी प्रतीत होती हैं।
- असली नीलम में रंगो की पट्टियां वक्री न होकर सीधी दिखाई देती है।
- नीलम हाथ में लेकर देखिये, अपेक्षाकृत हल्का प्रतीत होने वाला नीलम ही असली समझना चाहिए। असली नीलम स्पर्श करने से विशेष चिकनाहट का आभास देता है।
- हाथ में लेने पर असली नीलम कठोरता की अनुभूति नहीं देता। असली नीलम मुलायमियत की प्रतीति कराता है।
- एक परीक्षा यह भी है, असली नीलम के पास कोई भी तिनका लाने पर वह नीलम की ओर आकर्षित होकर चिपक जाता 1
नीलम के दोष – दोषयुक्त नीलम अनुकूल फल प्रदान करने के बजाय घातक परिणाम देता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से निम्न दोषों वाला नीलम धारण योग्य नहीं होता।
सुन्न: जो नीलम चमक रहित अथवा क्षीण चमक वाला होता है, ऐसे नीलम को सुन्न नीलम कहा जाता है। सुन्न संज्ञक ऐसा नीलम धारण करने योग्य नहीं होता। कहा जाता है कि ऐसा नीलम धारण करना प्रियजनों के लिए घातक होता है।
दोरंगा: श्रेष्ठ नीलम वह होता है जो पूर्णरूपेण एक रंग का हो रंग विभिन्नता वाला नीलम भी दोषपूर्ण माना गया है। इसे भी नहीं पहनना चाहिए। ऐसा नीलम दाम्पत्य सुख में बाधा कारक माना गया है।
क्रास: नीलम में किसी भी प्रकार क्रास जैसा चिन्ह नीलम को धारण योग्य नहीं रखता। ऐसे क्रास-दोष युक्त नीलम को धारण करने वाला व्यक्ति, कंगाल हो जाता है।
खड्ड:यदि किसी नीलम में गड्ढा दिखाई दे तो ऐसे नीलम को भी दोषयुक्त समझना चाहिए। ऐसा खड्ड-दोषयुक्त नीलम शत्रु वुद्धि करके शरीर को कष्ट देने वाला बताया गया है।
रक्त विन्दु: नीलम में लाल रंग के धब्बे दिखाई दें तो ऐसा नीलम भी धारण योग्य नहीं होता। ऐसा नीलम धारण करने वाले लोग पुत्र-सुख से वंचित होते हैं, और स्वयं भी अस्वस्थ रहते हैं।
जालक: किसी नीलम में जाल जैसा गुंथा प्रतीत हो तो ऐसे नीलम को दोषयुक्त समझना चाहिए। इसे धारण करने वाले व्यक्ति विभिन्न रोगों से पीड़ा पाकर कष्ट भोगते हैं।
दूधक: जिस नीलम में दूध जैसे धब्बे हों अथवा जो पूर्णतया दूधिया रंग लिये हो ऐसा नीलम दूधक-दोष से युक्त माना जाता है तथा धारण योग्य नहीं होता। कहा जाता है कि ऐसा नीलम धारण करने से लक्ष्मी का नाश होता है। और धारण करने वाला व्यक्ति दाने-दाने के लिए मोहताज हो जाता है।
गोमेद रत्न
गोमेद रत्न यद्यपि कई रंगों में उपलब्ध होता है लेकिन ज्योतिषीय दृष्टिकोण से राहु रत्न गोमेद वही कहलाता है, जो गो-मूत्र के रंग वाला हो।
गोमेद प्राप्ति स्थान – श्याम और न्यूजीलैण्ड से भी गोमेद रत्न प्राप्त होता है। दक्षिण अफ्रीका से भी गोमेद प्राप्त होते हैं। यहाँ प्राप्त होने वाले गोमेद रत्न पीले भूरे रंग के होते हैं। दक्षिण अफ्रीका में प्राप्त होने वाला यह गोमेद रत्न बिल्कुल अलग प्राप्त न होकर हीरे की खानों में हीरों के साथ ही प्राप्त होता है।
न्यूसाउथ वेल्स में भी अत्यन्त आकर्षक लालरंग की आभा युक्त गोमेद प्राप्त होते हैं। यहाँ प्राप्त होने वाले गोमेद सुन्दरता की दृष्टि से श्रेष्ठ माने जाते हैं।
भारत में भी गोमेद रत्न बहुतायत में प्राप्त होता है। भारत में गोमेद हिमालय के आसपास के पहाड़ी क्षेत्र तथा सिन्धु नदी के उद्गम क्षेत्र में प्राप्त होता है। बिहार के हजारी बाग क्षेत्र से भी गोमेद प्राप्त किया जाता है। उपरोक्त स्थलों के अतिरिक्त भारत के दक्षिणी भाग में ट्रावनकोर, कोयम्बटूर तथा विजयापट्टम भी गोमेद का उत्पत्ति स्थल है। भारत में प्राप्त होने वाला अधिकांश गोमेद गहरी काली आभा लिए कत्थई रंग का होता केवल कुछ स्थानों से ही कुछ अच्छा गोमूत्र के रंग वाला गोमेद प्राप्त होता है, लेकिन वह भी बर्मा तथा श्रीलंका के गोमेद की तुलना में निम्न श्रेणी का ही होता है।
तत्व की संरचना – राहु रत्न गोमेद जिक्रोनियम का मणिभ मात्र है। जिक्रोनियम का मणिभ होने के कारण गोमेद को अंग्रेजी में जिरकन नाम से पुकारा जाने लगा है।
आजकल बाजार में नकली गोमेद भी बहुतायत में बिक रहा । यह गोमेद खान से या अन्य प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त न होकर फैक्टरियों में बनाये जाते हैं। कहीं-कहीं तो काले, कत्थई या गोमूत्र के रंग वाले स्फटीक (कटिंग किये) को भी गोमेद बताकर बेचा जा रहा है। अतः अत्यधिक जांच परखा के बाद ही गोमेद रत्न धारण करने के लिए खरीदना चाहिए।
गोमेद की पहचान – असली गोमेद को 24 घण्टे तक गोमूत्र में रखा जाये तो गोमूत्र के रंग में परिवर्तन आ जाता असली गोमेद हाथ में लेने पर भारी सा महसूस होता है।
गोमेद के दोष – यदि किसी गोमेद में किसी भी प्रकार अथवा रंग का चकत्ता जैसा दिखाई दे ऐसा गोमेद भी धारण करने के अयोग्य होता है ऐसा गोमेद दुर्भावनापूर्ण एवं मृत्यु कारक माना गया ।
कभी-कभी गोमेद में काले रंग के बिन्दु जैसे दिखाई देते हैं। ऐसा गोमेद भी धारण करना श्रेष्ठ नहीं होता । कहा जाता है, कि ऐसा गोमेद स्त्री के लिए अरिष्ट कारक होता है।
साफ सुथरा न दिखाई देकर जो गोमेद परतदार सा दिखाई देता है, वह छाल दोषयुक्त होता है। ऐसा गोमेद धारण करने योग्य नहीं माना जाता।
लहसुनिया
लहसुनिया कई रंगों तथा कई प्रकार का प्राप्त होता है कई रंग और कई प्रकार की ही तरह स्थान तथा भाषा भेद के कारण यह रत्न विभिन्न नामों से पुकारा जाता है।
लहसुनिया प्राप्तिस्थल – भारत में विन्ध्य तथा सतपुड़ा की घाटियों में प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त भारत में ही त्रिवेन्द्रम के आस-पास भी लहसुनिया का उत्पत्ति स्थल है। यहां प्राप्त होने वाला लहसुनिया सामान्य कोटि का होता है।
बर्मा की मोगोक खान से प्राप्त होने वाले लहसुनिया को सर्वश्रेष्ठ कहा जाता है। यहां प्राप्त होने वाले लहसुनिया रत्न हल्का पीलापन लिये प्रायः निर्दोष प्राप्त होते हैं।
श्रीलंका से प्राप्त होने वाला लहसुनिया भी श्रेष्ठ माना गया है। यहां प्राप्त होने वाले लहसुनिया रत्न सुन्दरता, आकर्षण तथा विशेष चमक के होते हैं।
पश्चिम अफ्रीका के धाना राज्य में भी लहसुनिया रत्न प्राप्त होते हैं यहां प्राप्त होने वाला लहसुनिया भी हल्के पीले रंग का विशेष चमक तथा आभा लिए होता है। यहां प्राप्त होने वाले लहसुनिया को हेम वैदूर्य कहा जाता है।
अमरीका, ब्राजील, यूराल में प्राप्त होने वाला लहसुनिया रत्न भी उत्तम होता है।
लहसुनिया कई रंगों में प्राप्त होता है। लेकिन केतु रत्न के रूप में वही लहसुनिया उपयोगी होता हैं, जिसका रंग बिल्ली की आंख की तरह भूरा तथा आकर्षक चमक व कुछ हरी सी आभा लिए हो ।
तात्विक संरचना – लहसुनिया रत्न तन्तुमय पत्थरों से काटकर निर्मित किये जाते हैं। लहसुनिया का एक विभेद हेम वैदूर्य वैरिलियम का ऐल्यूमिनेट होता है। सभी लहसुनिया रत्न पेग्माइट नाइस एवम् अंबरकयुक्त परतदार शिला खण्डों से प्राप्त होते हैं। पहाड़ियों से बहने वाले प्राकृतिक नालों से भी लहसुनिया प्राप्त किये जाते है।
लहसुनिया की परख
- लहसुनिया देखने में कांचकीय आभा का आभास देता है, लेकिन पीछे की ओर देखने पर पत्थर होने का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।
- असली लहसुनिया में सफेद धारियां जैसी दिखाई देती हैं, इन्हें ब्रह्मसूत्र कहा जाता है।
- असली लहसुनिया को इधर-उधर घुमाने से इसमें उपस्थित धारियां भी साथ ही साथ हिलती प्रतीत होती हैं।
- असली लहसुनिया पीतवर्णी हरी आभा युक्त बिल्ली की आंख जैसा दिखाई देता है।
- लहसुनिया अपने रंग-रूप कठोरता आदि के आधार पर चार विभिन्न प्रकारों का माना गया है।
लहसुनिया के दोष
सुन्न दोष: चमकहीन लहसुनिया सुन्नदोष से पीड़ित कहा गया है। ऐसा चमक रहित लहसुनिया धारण नहीं करना चाहिए। ज्योतिष विद्वानों का विचार है कि ऐसा लहसुनिया धन नष्ट कराने में सहायक होता है।
खड्ड दोष: किसी भी प्रकार के गड्ढे या छिद्र से युक्त अथवा चिटका, टूटा लहसुनिया भी धारण करने योग्य नाहीं होता। कहा जाता है कि ऐसा खड्ड युक्त लहसुनिया धारण करने वाला व्यक्ति अपने लिए शत्रु उत्पन्न करता है तथा उनकी ओर से भयाक्रांत पीड़ा प्राप्त करता है।
चीरक दोष: लहसुनिया में क्रास जैसा चिन्ह भी रत्न को दोष युक्त बनाता है। ऐसा लहसुनिया भी शत्रुभय बढ़ाने वाला माना गया है।
रक्त बिन्दु दोष: लहसुनिया में यदि लाल रंग के बिन्दु जैसे दिखाई दें तो ऐसे लहसुनिया को भी दोषपूर्ण मानकर धारण नहीं करना चाहिए। कहा जाता है कि ऐसा लहसुनिया धारण करने वाला व्यक्ति कारावास का दण्ड भोगता है।
ज्वाला दोष: यदि किसी लहसुनिया रत्न में ज्वाला जैसा चिन्ह दिखाई दे ऐसा लहसुनिया भी दोषयुक्त माना गया है। ज्वाला दोष युक्त लहसुनिया को धारण करने योग्य नहीं माना जाता। विद्वान ऐसे लहसुनिया को पत्नी के लिए घातक बताते हैं।
श्रेष्ठ धारण योग्य लहसुनिया – श्रेष्ठ लहसुनिया ही धारण करना चाहिए। श्रेष्ठ लहसुनिया बिल्ली की आंख के समान रंग वाला पीत तथा हरित आभा से युक्त होता है।
श्रेष्ठ लहसुनिया वह है, जो विशेष चमक वाला, आकर्षक तथा बाहर निकलती किरणों से युक्त हो । श्रेष्ठ लहसुनिया उसे ही समझना चाहिए जो दाग, धब्बों रहित तथा ऊपर वर्णित दोषों से मुक्त हो । खुरदरा लहसुनिया श्रेष्ठ नहीं होता। चिकना तथा हाथ में लेने पर फिसलने वाला लहसुनिया रत्न ही श्रेष्ठ होता है। श्रेष्ठ लहसुनिया हाथ में लेने पर आकार से अपेक्षाकृत कम भारी प्रतीत होता है।
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